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कर्म
कर्म — चैप्टर 1–6- 1अर्जुनविषादयोग
युद्धभूमि पर अर्जुन का विषाद और अज्ञान का संकट।
47 श्लोक - 2सांख्ययोग
आत्मा की अमरता, कर्मयोग तथा स्थितप्रज्ञ के लक्षण।
72 श्लोक - 3कर्मयोग
निष्काम कर्म का मार्ग एवं लोकसंग्रह का सिद्धांत।
43 श्लोक - 4ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
दिव्य जन्म, कर्म का ज्ञान तथा ज्ञानयज्ञ।
42 श्लोक - 5कर्मसंन्यासयोग
कर्तृत्व का त्याग तथा समदर्शी दृष्टि।
29 श्लोक - 6ध्यानयोग
ध्यान साधना, मन का निग्रह तथा आत्मसंयम।
47 श्लोक
भक्ति
भक्ति — चैप्टर 7–12- 7ज्ञानविज्ञानयोग
परा-अपरा प्रकृति एवं चार प्रकार के भक्त।
30 श्लोक - 8अक्षरब्रह्मयोग
अविनाशी परम तत्त्व तथा अंतिम समय की साधना।
28 श्लोक - 9राजविद्याराजगुह्ययोग
परम गुह्य ज्ञान तथा अनन्य भक्ति का मार्ग।
34 श्लोक - 10विभूतियोग
ईश्वर की दिव्य विभूतियाँ एवं सर्वव्यापकता।
42 श्लोक - 11विश्वरूपदर्शनयोग
परमेश्वर के विराट स्वरूप का दर्शन।
55 श्लोक - 12भक्तियोग
भक्ति का सुगम मार्ग एवं उत्तम भक्त के लक्षण।
20 श्लोक
ज्ञान
ज्ञान — चैप्टर 13–18- 13क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
शरीर (क्षेत्र) तथा आत्मा (क्षेत्रज्ञ) का विवेक।
35 श्लोक - 14गुणत्रयविभागयोग
प्रकृति के तीन गुण (सत्त्व, रजस्, तमस्) एवं त्रिगुणातीत पद।
27 श्लोक - 15पुरुषोत्तमयोग
संसार रूपी वृक्ष तथा परम पुरुषोत्तम तत्त्व।
20 श्लोक - 16दैवासुरसम्पद्विभागयोग
दैवी और आसुरी सम्पदा के लक्षण।
24 श्लोक - 17श्रद्धात्रयविभागयोग
श्रद्धा, आहार एवं तप के तीन प्रकार तथा 'ॐ तत्सत्'।
28 श्लोक - 18मोक्षसंन्यासयोग
परम मोक्ष, स्वधर्म तथा पूर्ण शरणागति।
78 श्लोक
परंपरागत छह-छह-छह विभाजन तीन पंक्तियाँ बनाता है। हर पंक्ति में तीन अध्याय दिखते हैं और चौथा किनारे पर कटा रहता है, ताकि पता चले कि आगे और है। प्रगति केवल शुरू किए गए अध्याय पर दिखती है।
