नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्। दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो
हे विष्णु, आपको आसमान छूते हुए, कई रंगों में दमकते हुए, खुले हुए मुखों और चमकती विशाल आँखों के साथ देखकर मेरा दिल काँप रहा है; न हिम्मत बची है, न चैन।
यह श्लोक उस अनुभव को बताता है जब जीवन की विशाल, न रुकने वाली शक्तियाँ हम पर हावी हो जाती हैं। जब हमारी योजनाएँ बिगड़ जाती हैं और हमें अनजाने बदलावों का सामना करना पड़ता है, तब संतुलन खो देना स्वाभाविक है। खुले मुख और जलती आँखें समय के उस सब कुछ निगल लेने वाले स्वभाव की प्रतीक हैं, जो आख़िर में हर नाम और हर रूप को अपने में समा लेता है। सोचिए, किसी के करियर में अचानक बहुत बड़ा मोड़ आ जाए या जीवन बदल देने वाला कोई पड़ाव आ जाए; पहली प्रतिक्रिया अक्सर घबराहट और ज़मीन खिसकने जैसी होती है। गीता सिखाती है कि ऐसे वक़्त में मज़बूत होने का दिखावा करने के बजाय अपने डर को मान लेना ही उस गहरी, न हिलने वाली भीतरी शांति की तरफ़ पहला क़दम है, जो बाहर के हालात पर टिकी नहीं होती।
